जादवपुर में गेरुआ हाहाकार से शाकाहार तक बहाने तलाशता कुनबा

उधर दुनिया के छोटे बड़े देशों की निगाहें दुनिया की आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी और पीपीपी के 40% हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में होने वाली चर्चाओं पर लगी थी। उम्मीद लगाए बैठी थी कि ये देश मिलकर बौराये अमरीकी साम्राज्यवाद की लगाम कसेंगे, उसके मंसूबों पर पानी फेरेंगे। उधर पहली तिमाही के बढ़ा-चढ़ा कर जारी किये गए जीडीपी के आंकड़ों की सत्यता पर सिर्फ सूचित और शंकित लोग ही नहीं स्वयं मोदी की भक्त बिरादरी और कॉर्पोरेट के रोकडिये तक संदेह जता रहे थे : आर्थिक मसलों की दुनिया भर की आधिकारिक और विशेषज्ञ संस्थाएं उन्हें लेकर सवाल खड़े कर रही थीं। इधर ठीक उस बीच विभाजन के शहंशाह – डिवाइडर इन चीफ – और उनका कुनबा देश में साम्प्रदायिक और जातिगत ध्रुवीकरण को तेज करने के अपकर्म में जी जान से जुटा हुआ था।

उसके तूफानी दस्ते कहीं विश्वविद्यालयों पर धावे बोल रहे थे तो कहीं लोगों के रसोई घरों में घुसकर उनकी देगों और कड़ाहियों के ढक्कन उठाकर ताकझांक कर रहे थे, उनकी डाइनिंग टेबल्स पर बैठकर कौन क्या खायेगा, क्या नहीं खायेगा फरमान जारी कर रहे थे।   

9 सितम्बर को देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जादवपुर यूनिवर्सिटी पर त्रिशूल, तलवार और लंगोट धारी नागा साधुओं के एक दल ने धावा बोल दिया। जिस यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए उच्चतम स्तर का इम्तिहान पास करना होता है उसमें जबरिया घुसने के लिए आतुर नंगधडंग और कुपढ़ भगवाधारी अकेले नहीं थे – पश्चिम बंगाल की सरकार के मुखिया सुवेंदु अधिकारी खुद भगवा धारण करके कोई तीन किलोमीटर तक पैदल चलकर उनकी अगुआई कर रहे थे।

यह उसी गिरोह का नया हमला था जिसने कुछ दिन पहले इस विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर लगे विश्वविख्यात कलाकार नंदलाल बोस के बनाए प्रतीक चिन्ह को तोड़ दिया था। इस हरकत और इसके साथ की गयी हिंसा के विरुद्ध विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दर्ज कराई गयी एफ आई आर से खीजे और जादवपुर के आम छात्रों द्वारा इन दिनों आसाराम बापू विद्यार्थी परिषद् के निकनेम से पहचानी जाने वाली एबीवीपी की गुंडा वाहिनी को खदेड़े जाने से बिलबिलाये झुण्ड ने भगवा की आड़ लेकर वही करने की कोशिश की जो इनके वैचारिक आराध्य और प्रणेता हिटलर और मुसोलिनी अपने अपने यहाँ करके देख चुके थे।

बहाना वही झूठ था जो दस साल पहले जेएनयू के छात्रों के खिलाफ गढ़ा गया था। जिस सरकार के पास प्रशासन और पुलिस है वह कथित नारे लागाये जाने के मामले में कोई वैधानिक कार्यवाही करने की बजाय सडकों पर त्रिशूल और तलवार भांज रहा था। 

यह अकेली घटना नहीं थी। इसके पहले  कोलकाता में इसी गिरोह ने पहले अकेडमी ऑफ फाइन आर्ट्स के एक हिस्से को भगवा रंग दिया था। इसके कुछ दिन बाद एक प्रमुख बंगाली अखबार आनन्द बाजार पत्रिका – जिसका एबीपी चैनल भाजपा के गुणगान में लगा रहता है –  के दफ्तर की दीवार के हिस्से को भी भगवा रंग दिया था। इसको लेकर कड़ी प्रतिक्रिया को देखते हुए अपनी आनुवंशिक पहचान दोमुंही जुबान की पारंगतता का मुजाहिरा करते हुए कुछ भाजपा नेताओं ने इस घटना से पल्ला झाड़ा तो कुछ ने इसे अपनी शूरवीरता बताया।

कुल मिलाकर यह कि पहले घुसपैठियों के मुद्दे को मुखौटा बनाने के बाद अब कुनबा भगवा लबादा ओढ़कर धूर्तों की आख़िरी पनाहगाह धार्मिक राष्ट्रवाद की शरण लेकर बाकी सब बातों से ध्यान भटकाना चाहता है।  

बात यहीं तक नहीं थमी। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस साल की दुर्गा पूजा के लिए भी कई नए निर्देशों की घोषणा कर मारी। इसमें महाअष्टमी पर शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध और पूजा के बाद होने वाले मेले को रद्द किया जाना शामिल है। केरल के ओणम की तरह बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं है, यह बंगाली समाज का सांस्कृतिक महोत्सव भी है। इसके दौरान आयोजित होने वाले मेले केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, वे  बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक होते हैं।

ये समावेश एक-दूसरे से जुड़ने, सामुदायिक भावना को मजबूत करने और पारंपरिक कला व हस्तशिल्प को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण मंच भी प्रदान करते हैं।  बंगाल की इस मजबूत सास्कृतिक विरासत, यहाँ तक कि खुद दुर्गा के बारे में यह कुनबा कितना जानता है यह स्वयं उनकी सरकार के उस विज्ञापन से सामने आ गया जिसमे दुर्गा के ग्यारह हाथ बना दिए गए। जब इस पर बावेला मचा तो इसके एक नेता दुर्गा को एक अतिरिक्त हाथ देने का महत्त्व तक प्रतिपादित कर दिया। 

इधर इनकी नफरती शंख ध्वनि का निनाद चल रहा था कि उधर मोदी जिनके विवाह में जाने को आतुर तत्पर बैठे होने का सार्वजनिक एलान कर चुके हैं उस दुर्भाषा कथावाचक धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने अपनी पीपनी उठाकर बेस्वाद और बेसुरा शाकाहार राग छेड़ कर बंगालियों पर ही चढ़ाई कर दी।  इस कथित बागेश्वर बाबा ने  पश्चिम बंगाल के लोगों को दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन और मछली-मांस खाने के लिए धिक्कारते हुए उन्हें इस बुरी आदत को सुधारने का उपदेश सुना दिया।

उनके इस उलट मत्स्यासन की प्रतिक्रिया होनी ही थी, हुई भी। कहने को उन्होंने सफाई देने की औपचारिकता निबाह दी है मगर वह पुरानी पड़ गयी आजमाई हुई अदा की तरह है। असल में यह एक नया आख्यान बनाने की शुरुआत है। इसका उदाहरण चुनावों की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के बयान से मिल जाता है। योगी ने अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधते हुए निषादों के एक सम्मेलन में हुए कथित खानपान को ही मुद्दा बनाने की कोशिश की। इसे स्वयं मोदी सरकार ने ब्रिक्स के शीर्ष नेताओं की बैठक के विदाई भोज में शुद्ध शाकाहारी व्यंजन परोस कर और ऊंचे मुकाम पर पहुंचा दिया। 

जिस देश में 81% नागरिक किसी न किसी रूप और मात्रा में मांसाहार करने वाले हों,  जिस देश की बहुसंख्यक आबादी द्वारा माने जाने वाले धर्म ग्रंथों, वेदों और पुराणों, संहिताओं और महाआख्यानों यहाँ तक कि जिस मनु के बताये राज को कुनबा बहाल करना चाहता है उसकी स्मृति में भी मांसाहार के नियम, विधान और प्रावधान किये गए हों : उन्हें यज्ञों और पूजापाठ की अलग-अलग प्रणालियों का अंग बताया हो : जो देश इन दिनों शाकाहार की हिमायत में लगे दिख रहे कुनबे की मोदी सरकार के बारह वर्षों में दुनिया भर को बीफ बेचने वाले देशों में तेरहवे नम्बर से उछल कर दूसरे नम्बर पर आ गया है :  उस देश में अचानक शाकाहारवाद का यह कोहराम सिर्फ पाखंड भर नहीं है। 

यह एक वैचारिक दुराग्रह का हिस्सा है : एक ख़ास तरह के सांस्कृतीकरण, एक ख़ास तरह की जीवन शैली को जबरिया थोपने की सोची समझी योजना का अंग है। भाजपा शासित अधिकाँश राज्यों में आंगनबाड़ी के पोषण आहार और मध्यान्ह भोजन के मेनू से अंडा हटाया जा चुका है। जाहिर है कि यह सब कुछ सिर्फ शाकाहार या जीव हिंसा या अहिंसा इत्यादि के लिए नहीं हो रहा। 

यह संघ प्रतिपादित नव-ब्राह्मणधर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। जातिश्रेष्ठता की वर्णाश्रमी वर्तनी में एक और आधार पुनः स्थापित किया जा रहा है। भारत में बहुजन, दलित और आदिवासी समुदायों का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से – पोर्क, बीफ सहित मांसाहार का सेवन करता रहा है। कई वंचित वर्गों के लिए मांस, मछली और अंडे प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों के सबसे सस्ते और आसानी से उपलब्ध स्रोत रहे हैं। शाकाहार को अनिवार्य या श्रेष्ठ बनाने का दबाव उनकी पोषण सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। 

इसी के साथ यह भी है कि यह खानपान इन समुदायों की पसंद या नापसंद से अधिक उनकी विवशता के चलते है। जैसा कि जिस निषाद सम्मेलन में मछली खाने को लेकर योगी ने भृकुटि टेढ़ी की हैं उसके आयोजकों ने कहा कि मछलीपालन पर जीवित रहने वाले निषाद यदि मछली नहीं खायेंगे तो और क्या खायेंगे!! ऐसे में शाकाहार को “शुद्ध” या “श्रेष्ठ” बताना इन समुदायों की भोजन संस्कृति और खानपान की आदतों को कमतर और “अशुद्ध” दिखाने की कोशिश है। इस तरह इन समुदायों को ही हीन, छोटा और असंस्कृत बताने की कुत्सित समझ का हिस्सा है। 

इस दूरगामी मकसद के अलावा गेरुआ रक्षा और शाकाहार महिमागान के तीखे दीखते कोलाहल के पीछे लगातार उजागर होते अंधेरों को छुपाने के इरादे भी हैं। बाकी सारे प्रयत्नों के विफल हो जाने के बाद अब कुनबे को लगता है कि लोकप्रियता के लगातार गिरते ग्राफ को उग्र से उग्रतर किये जाते हिंदुत्व की बैसाखी की टेक लगाकर ही और नीचे जाने से रोका थामा जा सकता है। अब हिन्दू साम्प्रदायिकता की बूस्टर डोज, नफरत का रेडिएशन और ध्रुवीकरण की कीमोथेरेपी ही खटिया खड़ी होने से बचा सकते हैं।

मंदिर चढ़ावा लूट से कमाई बदनामी से ध्यान भगवा मुद्रा दिखाकर और मत्स्यासन लगाकर ही हटाया जा सकता है। इसी तरह से उस भद्द की झेंप छुपाई जा सकती है जो खुद भारत की अध्यक्षता वाले ब्रिक्स के शीर्ष नेताओं के सम्मेलन के बाद जारी हुए साझे वक्तव्य – नई दिल्ली घोषणापत्र  – में मोदी और उनके कुनबे के हिस्से में आयी है। दिल्ली घोषणापत्र के निष्कर्ष मोदी सरकार की अब तक की नीतियों को गलत ठहराने वाले निष्कर्ष हैं। 

45 पन्नों और 140 बिन्दुओं के नई दिल्ली घोषणापत्र में ब्रिक्स ने मोदी जिसे फादरलैंड बताकर आये थे, जिसे गज़ा के बेकसूरों पर बरसाए जाने वाले हथियारों की सप्लाई कर रहे हैं और उसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं, उस इजरायल की सख्त भर्त्सना की है। ब्रिक्स समूह फिलिस्तीन पर इजरायली हमले और गज़ा में नरसंहार पर इतने कड़े और स्पष्ट शब्दों में पहली बार बोला है। नई दिल्ली घोषणापत्र ने न सिर्फ ग़ज़ा में युद्धविराम बनाए रखने और मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की बल्कि फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन और ग़ज़ा में किसी भी भौगोलिक स्थिति या आबादी में बदलाव का विरोध भी किया। 

ब्रिक्स ने कहा कि इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष का न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान शांतिपूर्ण तरीके से ही संभव है। इसके लिए ब्रिक्स समूह ने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया, जिसमें 1967 की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सीमाओं के भीतर एक संप्रभु और स्वतंत्र फ़लस्तीन राज्य की बात की गई है और जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम बताई गई है। ग़ज़ा की मानवीय स्थिति पर चिंता जताते हुए ब्रिक्स देशों ने नागरिकों, स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य नागरिक ढांचे पर हमलों तथा मानवीय सहायता रोकने की निंदा की। 

इसी के साथ कहा है कि वे क़ब्ज़े वाले यरुशलम की कानूनी और ऐतिहासिक स्थिति बदलने वाली किसी भी एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने शहर के सभी धार्मिक और पवित्र स्थलों की पवित्रता का सम्मान करने और सभी लोगों को बिना बाधा धार्मिक स्थलों तक पहुंचने, अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने का अधिकार देने की अपील की। 

आजादी के बाद से भारत सरकार की यही आधिकारिक नीति रही है – मगर मोदी राज में ठीक इससे उलट आचरण किया जाता रहा। उनका वैचारिक कुनबा इजरायल में अपना आदर्श ढूंढता रहा और फिलिस्तीन का समर्थन करने वालों को देशद्रोही तक बताता रहा था। ऐसे में भारत के हस्ताक्षरों सहित इस तरह का खरा वक्तव्य जारी होना जहां एक सराहनीय कदम हैं वहीँ अपरोक्ष रूप से आरएसएस – भाजपा के मुंह पर एक तमाचा और स्वयं मोदी के रुख की निंदा भी है।  

ब्रिक्स ने “22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमले” जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी, की निंदा करते हुए आतंकवाद के विरुद्ध अपना नजरिया साफ़ किया है। इसी के साथ घोषणापत्र में साफ़ साफ़ शब्दों में कहा गया है कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल सभी लोगों और उन्हें समर्थन देने वालों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।” सभ्य समाज और दुनिया भर के शांतिकामी लोगों के लिए यह बयान राहत देने वाला है – मगर कुनबे से उसका ब्रह्मास्त्र छीनने वाला भी है, जो आतंकवाद को ख़ास तरह से परिभाषित करके उसे मुस्लिम समुदाय के विरूद्द उन्माद भड़काने का जरिया भर मानता रहा है। 

इन सारी बातों पर गेरुआ डालने के लिए ही भाजपा बंगाल में भगवा सम्मान यात्रा निकाल रही है, उसके योगी और शास्त्री मार्का लोग खाने की थालियों में झाँक रहे हैं। मगर लगता नहीं कि इन बहानों से उन तम्बुओं को साधा जा सकेगा जिनके उखड़ने की संभावना अब दीवार पर लिखी इबारत में बदलती जा रही।

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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